ऋषि और मुनि में क्या अंतर होता है ?
जो अंतर एक लेखक और पाठक के बीच होता है वही अंतर ऋषि और मुनि के बीच होता है।
ऋषि researcher होते है। ये शोध करते है , नया प्रयोग करते है , नये सिद्धांतों को खोजते है और उसे अस्तित्व में लाते है।
मुनि मनन करते है , चिंतन करते है और ऋषियों द्वारा किये गए शोध को अपने जीवन में उतारते है।
भारतीय संस्कृति में ऋषियों और मुनियों का जिक्र मिलता है। सिर्फ हिन्दू धर्म में ही ऋषि, मुनियों की सनातन परंपरा का वर्णन मिलता है। सिर्फ सनातन धर्म में कठिनतम तपस्या का प्रावधान है। इन तपस्याओं के द्वारा आत्मतत्व और परमात्मतत्व की बारीकियों को खोजा गया है।
अगर सनातन धर्म के ऋषि और मुनि नहीं होते तो नवसृजित धर्मों के अनुयाइयों द्वारा इतनी तपस्या नहीं की जा सकती थी। सनातन धर्म को छोड़कर अन्य सभी धर्म में तो भोगने की प्रधानता है। भोग करने के साथ आध्यात्मिक स्पंदनों को महसूस नहीं किया जा सकता है। इसलिए तपस्या जरुरी है।
एक कहावत है -बिना आग में तपाये लोग फौलाद नहीं बन सकता। भट्टी में जाने पर जिस प्रकार अयस्क की अशुद्धियाँ निकल जाती है उसी प्रकार तपस्या करने से शरीर के विकार निकल जाते है। इस विकाररहित शरीर से ही आध्यात्मिक स्पंदनों पर काम किया जा सकता है।
आध्यात्मिक शोध के दौरान शोध स्थल भी महत्व रखता है। वैसे स्थल जहाँ ध्वनि प्रदुषण, वायु प्रदुषण,जल प्रदुषण आदि नहीं हो ऋषिगण आध्यात्मिक शोध के लिये ऐसे ही स्थानों को चुनते है। इसलिये वे पहाड़ों के कंदराओं की तरफ जाते है। वीरान जंगलों में जाकर रहते है।
भोजन,नींद,सुरक्षा,यौनाचार इन चार शारीरिक जरूरतों से ऋषिगण यथासंभव अपने-आप को अलग रखते है। मुनि विवाह करते है, ऋषिगण अपने आप को विवाह से दूर रखने का प्रयास करते है।
वशिष्ट मुनि थे, कश्यप मुनि थे,ये विवाहित थे।
© राहुल देवाशीष
