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Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·2 min read·

सभ्यता और संस्कृति का नामोनिशान

दुनिया में सभ्यता और संस्कृति का नामोनिशान कहीं है तो वह भारत ही है। ये दो शब्द मात्र बाह्याचार को नहीं दर्शाते परंतु उन जीवन मूल्यों के परिचायक हैं जिन्हें इस भारत भूमि में हजारों सालों से संरक्षित किया गया है। अहिंसा, सत्य के सिद्धांत चिरकालीन हैं परन्तु आज के समय में इनका आभाव हो गया है।

आज हम अमेरिका को विश्व का सबसे ऊंचा देश बताते हैं कि देखो देखो वहां कितना पैसा है और एक हमारा भारत कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, धार्मिक कलह में ही उलझा हुआ है। निश्चित ही हमारी समस्याएं अपार हैं परंतु यदि कोई देश ऐसा है जो मानव को उसकी जड़ों से जोड़े जो देश , काल, परिस्थिति से परे है तो वह भारत ही है।

अरबी देशों में यदि ईश्वर के प्रति कटु वचन तुम्हारी जिह्वा पर आ जाए तो समझ लो मिल गया मृत्य दंड। वहां पर महिलाओं की, बच्चों की हालत प्राप्त आंकड़ों से किसी भी प्रकार अच्छी नहीं कही जा सकती। पुरुष वर्चस्व वहां अधिक है तथा सरकार धर्म की गुलाम। भारत महान क्यों है? क्या है जो इस देश को आज भी जिन परिस्थितियों से यह गुजर रहा है उनमें भी एक आदर्श राष्ट्र की छवि देता है।

हम अधिक अंतर्मुखी हैं। हमनें जाना कि जीवन जितना बाहर दिख रहा है उसका मूल हमारे भीतर ही विद्यमान है। हम सत्य के पथिक हैं असत्य के नहीं। देखने वाले की दृष्टि में जो ठेली लगाए खड़ा है वह छोटा आदमी हो सकता है परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत होगा। यह उस दृष्टि से ही देखना संभव है जो सबको अपने में तथा अपने को सब में देखती है।

हमने ऊंचाई का मापदंड व्यक्ति के विचार, व्यवहार, चरित्र को माना है परन्तु पाश्चात्य सभ्यता के अनुकरण ने हमें अंधा कर दिया है। हम भारत को एक मंदिर नहीं समझते जिसकी रक्षा हमें स्वयं अपने आचरण से करनी है नहीं तो वह दूषित हो जाएगा उन कुप्रभावों से जो चारों ओर से उसे घेरे हैं।

मंदिर से आशय यह नहीं कि यह देश मात्र हिन्दुओं के लिए है परन्तु यह देश तो मानव की आदि आकांक्षा मुक्ति का प्रतीक है, ईश्वरीय प्रकाश की ओर लौटने का प्रतीक है। यह सभी धर्मों में बताया गया है परन्तु न ही हम अपने धर्म को सही प्रकार जानना चाहते हैं न ही यह स्वीकार करना चाहते की हम धर्म के लिए नहीं धर्म हमारे लिए है।

धर्म ही भारत की पहचान है उसी का परिष्कृत रूप आध्यात्म कहलाएगा। अपने आप का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है यही यहां का संदेश है। दूसरे राष्ट्र व्यक्ति निर्माण को तवज्जो नहीं देते परंतु उसे एक औजार समझते हैं।

© सिद्धार्थ राणा