सद्बुद्धि का मंत्र
गायत्री मंत्र को सद्बुद्धि का मंत्र कहा गया है। यह क्या है जिसका महत्व संसार की किसी भी संपदा से अधिक हमारे ऋषियों ने माना है। मंत्र को शास्त्रीय भाषा में वह ध्वनि बताया गया है जो मन को शांत कर दे, निर्मल बना दे। यह मन ही तो हमारा मित्र या शत्रु है। एक ऐसा हाथी है कि जब तक उसके ऊपर सवार हो उसे चलाया न जाए तब तक साथ नहीं देता।
मंत्र का संबंध ऊर्जा शरीर से है। एक मंत्र दूसरे से भिन्न इस ऊर्जा शरीर के ही कारण होता है। हमारे उपनिषदों में मनुष्य को पंच कोषों का समुच्चय बताया गया है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय। इनमें प्राणमय मंत्र की क्रिया का आधार है। श्वास प्रश्वास में मंत्र जब घुलता जाता है तो अपनी ऊर्जा से हमें सभी विक्षिप्तताओं से उभार लेता है।
मानव जीवन का लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार है। इसके लिए निरंतर आत्मदृष्टि से आगे बढ़ने का विवेक होना चाहिए। गायत्री मंत्र से ज्यादा शक्तिशाली इस कार्य हेतु कुछ नहीं। इसे किसी विशेष परिणाम हेतु नहीं परंतु मात्र अपने को सन्मार्ग पर आरूढ़ रखने की प्रेरणा के साथ इसमें अपने को समा देना होता है।
यह कितनी अद्भुत बात है कि हम स्वयं वह हैं जिसे पाने के लिए संसार में भटकते हैं। या अपने को अपूर्ण मान दर दर की ठोकरें खाई जाएं या पूर्ण हो निष्काम कर्म के पथ पर चला जाए। आध्यात्म पथिक वही है जो आत्मा की महानता को जान सांसारिक प्रपंचों से गुजर भी निर्लिप्त बना रहे। मंत्र के संदर्भ में यह भी जानना आवश्यक है कि उसका अर्थ मानव निर्मित है परन्तु ध्वनि शाश्वत है।
ध्वनि स्रोत से जोड़ती है। हम मंत्र को उस अर्थ में देखते हैं जो हमारे समर्पण के अनुरूप हो।
© सिद्धार्थ राणा
