सम्वर्द्धन करें
आओ मिलकर सभी यजन करें । होकर संकल्पित नवोन्मेष से, सुपथ का सृजन करें । हुए है तिरोहित जो सामर्थ्य अपना, पुनः उसका अर्जन करें । हो उठे धरा से अंबर तक गुंजित, ऐसा गर्जन करें ।
अन्तर्मन में पल्लवित दुर्भावों का अब मर्दन करें । होकर दृढ़ संकल्पित,ज्ञानपुंज का सदा सम्वर्द्धन करें । शौर्य ,त्याग से सिंचित हो,जनवेदना का हरण करें । जीवन के हर क्षण को मानवी उत्कर्ष, उत्थान में अर्पण करें ।
वक्त की पुकार है, स्वयं से स्वयं में परिवर्तन करें । यह तन ,मन और जीवन मातृभूमि को समर्पण करें । सृष्टि में गुंजित मधुर तान का, आओ सभी श्रवण करें । अनमोल तौफा मिला जो नियन्ता से, सभी मिलकर उसका संरक्षण करें ।
निर्भिक, निडर बन जीवन के पुलकित बगियाँ में बिचरण करें । जन जन के अन्तर्मन में ज्ञानपुंज जगमगाने का प्रण करें । अनुपम है मनुज तन इसमें प्रेम, सौहार्द, संयम, सेवा, संतोष ,संकल्प का वरण करें । जीवन के हर क्षण में घोर तिमिर से रण करें ।
©सतीश कुमार पांडेय
