संगीत का आधुनिकीकरण
आज भारत अपने को भूल गया है। जो रह गया है वह उस उच्चता के समक्ष कुछ भी नहीं जिसे यहां के ऋषियों ने जीया है। किसी भी क्षेत्र में देख लीजिए। जिस संगीत को आज व्यक्ति बड़े मौज से सुन रहा है वह कितना अधोगामी है इस पर विचार किया जाना चाहिए। वह किसी ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं करता, हमारे महापुरुषों के जीवन को प्रस्तुत नहीं करता, न ही वर्तमान समाज की कुरीतियों पर प्रकाश डालता है।
ऐसा संगीत किस काम का जो मात्र नशे, धोके, हिंसा, कामुकता की तस्वीर ही मन पर उतारे। हमारा शास्त्रीय संगीत प्रकृति में व्याप्त विभिन्न ध्वनियों के चेतनात्मक अनुसंधान पर आधारित है। हमने अपनी आत्मा के दर्शन जिस रूप में प्रकृति के संसर्ग में रह किये उसे ही ध्वनि का रूप दे संगीत का निर्माण किया है।
उगते सूर्य के साथ प्रकृति में हो रही हलचलें, नदी की सरसराहट, बरखा की रिमझिम ध्वनि जो भी अंतःकरण को छूती गई अनाहत से आहत नाद का रूप लेने में सफल रही। आज का संगीत हमें निर्मल नहीं बनाता, उल्टा उद्विग्नता उत्पन्न कर मन को ऐसी दिशाओं में घूमने पर विवश करता है जो उसकी स्वाभाविक प्रकृति नहीं।
मजे के उद्देश्य से बनाया संगीत इस शब्द पर कलंक है क्योंकि संगीत वह है जो जोड़े और जुड़ना अपने आप को समष्टि से है। मनुष्य मात्र दुनियादारी जानता है पर वह उस सौंदर्य से अनभिज्ञ रहता है जो चारों ओर फैला है।
इतनी सुंदर दुनिया पर हमारे अहं का मिट जाना कितना सरल है परन्तु जिस कुबुद्धि से हम भौतिकता की अंधाधुंध दौड़ में शामिल हैं वह हमें कुछ अधिक देखने नहीं देती। संगीत का जब आधुनिकीकरण हो चुका है तो उसे जीवन की सच्चाई बतानी चाहिए। विचारों को सुधारने वाला संगीत न हो तो उसे सुन हम विकृति को ही बढ़ावा देते हैं।
© सिद्धार्थ राणा
