शास्त्रीय संगीत की महानता
शास्त्रीय संगीत की महानता उस शाश्वत ध्वनि को प्रदर्शित करने में है जो जीवन का अभिन्न अंग है परन्तु जिसे भूल मानव एक उच्च जीवन से नीचे गिर जाता है। उदाहरण के लिए हमें एक वाक्य दे दिया गया और कह दिया गया कि इसे गाओ। हम जैसा हमारी स्मृति कहती है वैसा गाने लगते हैं। यहां हमारा मनोविनोद ही कार्यरत रहता है।
परंतु जब उन्ही शब्दों के पीछे अखंड स्वर जुड़ जाते हैं जो परिवर्तित नहीं होते तो उस संगीत का जन्म होता है जो मन को एकाग्र करता है। प्राचीन काल में संगीत का उद्देश्य ही मन को एकाग्र करना था विक्षिप्त तो आज का संगीत करता है। सा, रे, ग, म, प, ध, नि सात स्वर आरोह अवरोह में ऊर्जा के उर्ध्वगमन और अधोगमन को दर्शाते हैं।
इन्हीं में फेर बदल कर विभिन्न राग उत्पन्न होते हैं जो किसी विशेष समय में ही गाए जाते हैं। यह कितनी बड़ी दृष्टि हमारे ऋषियों को मिली कि उन्होंने यह पहचाना की किस समय कौन सा स्वर और उसके अनुरूप राग पूर्णता को प्राप्त होता है। स्वर मात्र ध्वनि नहीं वे मनुष्य की चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ हैं।
स्वरों को जो कि अपने रूप में बदलते नहीं मात्र परिवर्तित होते हैं इस प्रकार गुंजित करना कि साधक को एक आत्मिक उत्कर्ष की अवस्था प्राप्त होए यह भारतीय संगीत में ही संभव है। स्वर उस मौन के परिचायक हैं जो बदलता नहीं परन्तु जिस पर हमारा जीवन गतिशील है।
यदि हमें शास्त्रीय संगीत न भी आता हो तो भी अपने संगीत को हम ढूंढ सकते हैं यदि संसार के शोर में हम अपने आप को सुनना सीख जाएं। यह दुर्लभ कला है क्योंकि इसके लिए राजहँस की भांति दूध और पानी के मिश्रण में दूध को ही चुनना आना चाहिए।
© सिद्धार्थ राणा
