शेरनी
फ़िल्म: "शेरनी" निर्देशक : अमित मसूरकर कलाकार: विद्या बालान, बिजेंद्र काला, नीरज कबी, विजय राज़, ईला अरुण, शरत सक्सेना और अन्य। प्लेटफॉर्म:- अमेज़न प्राइम
"अगर विकास के साथ जाओ तो एनवायरामेंट को बचा नहीं सकते और अगर एनवायरामेंट को बचाने जाओ तो विकास बेचारा उदास हो जाता है।" शेरनी फ़िल्म का ये डायलॉग विकास और प्रकृति के टकराव के व्यवहारिक पक्ष को उजागर करता है।
पिछले महीनें हीरे की भेंट चढ़ते बक्स्वाहा जंगल की ख़बर जब बाहर आयी तो कई सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों समेत हम सबनें अपने-अपने तरीके से उस ख़बर पर अपनी प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया पर बक्स्वाहा जंगल को बचाने के लिए एक मुहिम सी चल पड़ी।
दरअसल पर्यावरण के मुद्दे पर छिड़ी ये बहस नयी नहीं है। ये मुद्दे हर साल मॉनसूनी बारिश की तरह हमारे बीच चर्चा का विषय बनते रहते हैं। बस फ़र्क़ इतना होता है कि हर बार देश का एक नया भू-भाग इस पर्यावरणीय विनाश का केंद्र बनते हैं। कभी "बक्स्वाहा" तो कभी "आरे" तो फिर कभी "अरेरा हिल्स" के सिमटते जंगल के मुद्दे हमारी पर्यावरणीय उदासीनता की पोल खोलते रहते हैं।
ऐसे ही एक पर्यावरणीय विषय पर आधारित है फ़िल्म "शेरनी" की कहानी। फिल्म के लीड रोल में है विद्या विंसेट (विद्या बालान) जो जंगल और जंगली जानवरों की रक्षा करते हुए एक फॉरेस्ट ऑफिसर के किरदार में अपनी एक्टिंग से हमेशा की तरह प्रभावित करती है।
फ़िल्म आदमखोर बाघिन को पकड़ने में जुटे वन विभाग के अधिकारियों और फॉरेस्ट फ्रेंड के जुझारूपन के बहाने असल में सिस्टम के उन लोगों से भी रूबरू करवाती हैं जो बदलाव तो लाना चाहते हैं पर सिस्टम के दाँव-पेंच उनकी मेहनत पर पानी फेर देता है। जहाँ एक तरफ जंगलों पर आश्रित ग्रामीणों में आदमखोर बाघिन की वजह से दहशत है तो वहीं स्थानीय नेताओं के लिए ये महज़ एक चुनावी मुद्दा जिसे जीतने के लिए वो लोगों को अपने-अपने हिसाब से बड़गलाते हैं। दूसरी तरफ एक शिकारी के लिए गाँव में ये आतंक का माहौल महज़ एक रिकॉर्ड बनाने का बहाना है। जिसमें वो सफल भी हो जाता है।
ये फ़िल्म न सिर्फ आदमखोर बाघिन के बहाने समाज के नंगे हो चुके चेहरे को दिखाती है बल्कि पर्यावरणीय मुद्दों पर व्यक्तिगत और सांस्थानिक उदासीनता को भी दर्शाती है।
फ़िल्म में किरदारों की बात करें तो विद्या का किरदार उन लेडी ऑफिसरों की निजी ज़िंदगियों के क़रीब भी ले जाती है, जो अपने काबिलियत के बलबूते पुरुषवादी समाज में खड़ी होना चाहती हैं। लेकिन उन्हें कभी विभागीय तो कभी राजनैतिक षड्यंत्रों का सामना करना पड़ता है।
पूरी फ़िल्म नाटकीयता के बजाय स्वाभाविकता के आधार पर बुनी गयी है। जिसकी वजह से फ़िल्म कई जगह पर बोर करने लगती है। पर बिजेंद्र काला, नीरज कबी, विजय राज़ और शरत सक्सेना जैसे मंझें हुए कलाकार अपनी अदायगी से स्क्रिप्ट के अधूरेपन की कमी को पूरी कर जाते हैं।
क्राइम, थ्रिलर, सस्पेंस और कॉमेडी से इतर आप कुछ अलग, नया और स्वाभाविक देखना चाहते हैं तो "शेरनी" आपको निराश नहीं करेगी।
©मौसम जायसवाल
