Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

शून्य

शून्य में बैठा हुआ, टटोल रहा खुद को। कुछ बाकी है, वादे निभाने अभी बाकी है। सबकुछ बिल्कुल शांत, खुद से खुद संवाद। रोचक है, सुनहरी आनंद लिए, दीपत्मान भी।

मन से आत्मा की बातचीत, पर शांत भी। सभी कुछ होते हुए भी, कुछ नहीं, बिल्कुल शून्य। संपूर्णता का ऐहसास लिए, जमीन से जुड़ने की खुशी। शून्य में बैठा हुआ, टटोल रहा खुद को।

सबकुछ बिल्कुल साफ़ है, कहां जाना है। मन आत्मा का संवाद ऐसा, क्या सही भान है। रास्ते दिखाते, एक रूपरेखा खींचती जीवन की। सब टिमटिमाता, चमकाता, धुंधलापन छंटता हुआ।

शून्य का भी महत्व ऐसा, खुद की खोज होती। शून्य में बैठा हुआ, टटोल रहा खुद को। जब होती संशय का डेरा, बैठ जाता शून्य में। अंधेरा साफ़ दिखाता, एक नया ऐहसास आत्मविश्वास।

खुद से खुद का संवाद, अतिआवश्यक। अपने से जुड़ने की, मन आत्मा का संवाद जनकल्याण की सोच उभरती, सर्वांगीण का आभास। ब्रह्माण्ड से तार जुड़ना है, मन आत्मा का संवाद।

नहीं होते भी, सबकुछ झलकता बिल्कुल साफ़। असीम ऊर्जा छिपा है, शून्य में, शांत है। मन आत्मा का संवाद जरूरी, सभी के लिए। सभी सीमाएं मिट कर, एकाकार की धुरी में लीन।

शून्य में बैठा हुआ, टटोल रहा खुद को। कुछ बाकी है, वादे निभाने अभी बाकी है। सबकुछ बिल्कुल शांत, खुद से खुद संवाद। रोचक है, सुनहरी आनंद लिए, दीपत्मान भी।

#मन #आत्मा #शून्य

©#मिथिलेश कुमार