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Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
22 May 2021·1 min read·

सीने में आग अभी बाँकी है

एक तरफ सूकूँ की गोद है, सो जाने के लिये,मूँदकर आँखों को।

दुजी तरफ असहनीय संघर्ष है, मर जाने के लिये,रोककर साँसों को।

जितना हासिल हुआ है नाकाफी है, लगता है,सीने में आग अभी बाँकी है।

रूहें खड़ी होती है अभी भी, रगों में खून खौलती है अभी भी।

परिंदों-सा बेघर घूमने की आजादी है,फिर भी, चारदीवारी में कैद रहने का मन आदी है।

बेखौफ होकर निकलता हूँ सबेरे अपने घर से, बटोरकर शाम तक कुछ-न-कुछ ले आता इस शहर से ।

© राहुल देवाशीष