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तब फिर फाग सजाना तुम
सुना रहा हूँ सुनो कहानी, सुनते-सुनते ना सो जाना तुम !
बेला भले विषम कटे हो, दिनचर्या पर ना रो जाना तुम !
याद तुम्हारी बहुत सुहानी, यादों में ना खो जाना तुम !
यादों के रस्सा-कस्सी में, कसकर मेरा हो जाना तुम !
चंदा-तारों की शीतलता में, बेशक हो रात बिताना तुम !
सूरज के मानिंद नित उगना, पर, ख़ुद को ना कभी जलाना तुम !
अब अध्याय गहन हैं आगे, सपनों में ना आग लगाना तुम !
जब दो जिस्म एक जान हो जाएं, तब फिर फाग सजाना तुम !
©कुमार
