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तंग-गलियां
एक नहीं, दो नहीं इन तंग गलियों में टूटी-बिखरी पड़ी चूड़ियाँ अनगिनत हजार हैं ! पर, किसी खुशफहमी में मत जीना रोज टूटते लाखों ख़्वाब यहाँ साहेब, ये चूड़ियाँ का नहीं जिस्म का बाज़ार है ? चूड़ियों के इक-इक टुकड़े में गुम हो गईं यहाँ करोड़ो क़त्ल के दास्तान उनकी दर्द से जिस्म ही नही रूह तक लहूलुहान हैं ! और, गुलों के लहूलुहान होने पर भी बंद हर एक ज़ुबान हैं ! सब के लिए ये सिर्फ़ एक समस्या ! किंतु, किसी के पास नहीं इसका कोई समाधान हैं ?
©# कुमार
