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Aman Kumar Vikki
Aman Kumar VikkiCourseLiteraturePoetry
13 Sept 2022·1 min read·

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विज्ञापन निकले साल हो गए परीक्षा केंद्र पर केंद्राध्यक्ष मालामाल हो गए।

बंद कमरे में गुल खिले खुशी से गाल गुलाल हो गए।

दोपहर में प्रश्न पत्र उड़ा लोगों के सपने हलाल हो गए।

वर्णवाल की वो किताब भी पड़ी फीकी, सिस्टम से खिलवाड़ हो गए, ए सिस्टम बाबू कमाल हो गए।

माना पिछले साल मजबूरी थी, पर इस बार इतनी भी क्या जरूरी थी ?

माना अरबपति बनने का सपना था पर सिस्टम का तो ध्यान रखना था।

करवा लिए खूब सिस्टम से खिलवाड़ अब एक काम और कर दो सरकार।

विज्ञापन निकाल कर बतला दो और कब तक होगा सिस्टम से खिलवाड़, इस पर एक तारीख दे दो सरकार।

©अमन कुमार (विक्की)