व्यथा किसान की
मैं भी अपने खेतों से गद्दारी करके आया हूँ ? माँ-बाप संग ख़ुद का भी मन भारी करके आया हूँ ! ...
जब सरकारी कुनबे में सिर्फ़ विलासिता ही छाया ! कैसे कहूँ कि मैं भी उस वक़्त का सताया हूँ ?
<!--more--
पर, क्या करता जब किसान चले गये हाशिये पर ! और, खेती-किसानी पर हर तरफ़ काला साया हैं ?
जब ख़ुद से संवाद हुआ ख़ुद ने ख़ुद को कितना कहा ! मन की मन तक मान ना पहुँचा मन ने भी तब कितना सहा हैं ?
सब अपने आप में स्वयंभू किसान नेता कहलाया हैं ! और, किसानों के ज़ख्मों को यूँ कुतर-कुतर सहलाया हैं ?
साल-दर-साल होता किसानों के साथ ये दंश रहा ! पर, वोटों की वंशावली में सब नेताओं का एक ही वंश रहा हैं ?
किसानों का सच्चा हितैषी कौन है ! ये जताने को धरातल पे सब मौन है ?
©#कुमार
