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Aman Kumar Vikki
Aman Kumar VikkiCourseLiteraturePoetry
23 Jul 2021·1 min read·

वेतन

श्रीमान जी को माह के पहली तारीख का वेतन बैंक जाने के लिए सुगबुगा रहा था।

मन में ख़रीददारी की यादें बीबी-बच्चों के लिए जरूरत की लिस्टें कुछ छूट न जाने की बातें खरीददारी के बाद खाली पर्स मन को खिन्न सा कर रहा था।

वेतन पूर्णमासी का चाँद हो चुका है रात दर्शन देकर ढलते ढलते गुम हो रहा है।

ऊपरी आय वाली कमाई अमावस की रात हो गई थी घटते घटते रकम शून्य वाली बात हो गई थी।

राशन की दुकान पर अंगद रूपी पैर जमाए उधारी हटने की नाम पर ऊपरी कमाई कि हाथ मांग रही थी।

'©अमन कुमार (विक्की)