विश्व का लक्ष्य
विश्व के सभी देशों का अपना एक लक्ष्य है। हर देश अपने को ऊंचा दिखाना चाहता है किसी न किसी रूप में। अमेरिका एक आर्थिक एवं राजनैतिक महाशक्ति के रूप में खड़ा है। परंतु उस देश में संस्कृति का अभाव है जो उनके राष्ट्रपति के व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है। वे दूसरे राष्ट्रों से ऊपर रहना चाहते हैं शायद इसीलिए नागरिकों में अपने यहां के लोगों को तवज्जो दे रहे हैं।
अमेरिका को फिर से महान बनाने के पीछे यही रणनीति है कि विदेशियों को बाहर किया जाए जो उसकी आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति को कम कर रहे हैं। उस देश की शुरुवात भी कुछ ऐसे ही हुई है जब ' रेड इंडियन्स ' को बेदखल कर दिया गया था या उनका व्यापक नरसंहार हुआ। यह यूरोप से अट्ठारहवीं शताब्दी में फ्रेंच लोगों के आगमन से जुड़ी घटना है।
अमेरिका का वर्तमान स्वरूप जनजातीय है। वहां पहले से ही एक प्रकार के लोग नहीं रहे हैं। फिर भी आज अमेरिकियों को एक खास परिधि में लाया गया है जो उन्हें बाकी विश्व से अलग कर सके। चीन ने भी कुछ ऐसी ही रणनीति अपनाई है। वह तो विस्तारवाद से महाशक्ति बनने की ओर बढ़ना चाहता है। ये देश भारत से अलग किस प्रकार हैं। भारत ने न अपने लोगों पर अधिकार जमाया है न किसी दूसरे देश में साम्राज्य के विस्तार को तवज्जो दी है। हमने सभी को अपनाया तथा यही अपनी विशेषता भी रही है।
दुनिया के किसी देश में इतनी व्यापकता नहीं जितनी भारत में है। जितनी भाषाएं, धर्म संप्रदाय, जनजातिवर्ग, त्योहार, भौगोलिक संरचनाओं से भारत बना है वैसा कहीं देखने को नहीं मिलता। जब अंग्रेज भारत छोड़ गए तो उन्हें यही लगा कि इतनी विविधता भरा देश ज़्यादा समय एक न रह सकेगा। हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान धर्म आधारित था तथा इसी बात को ध्यान में रख जब उसने उर्दू को 1971 में राष्ट्रीय भाषा घोषित किया तो बंगलाभाषी लोगों के विद्रोह से बांग्लादेश के निर्माण को वह रोक न सका।
भारत आज भी अविभाजित है तथा हमेशा रहेगा क्योंकि उसका आधार इसके संविधान में उल्लिखित समता, भ्रातत्व, न्याय के सिद्धांतों पर है। यह बातें विश्व के लगभग सभी संविधानों में हाेंगी परंतु किस हद तक उनका पालन हुआ है यह विचारने योग्य है। आज भारत का संदेश साफ है। वह विश्व एकता का परिचायक है तथा अपने मूल्यों पर द्रढ़ रह ही वह दूसरों को सीख दे सकता है।
हम अमेरिका की तरह आर्थिक महाशक्ति नहीं बनना चाहते न ही चीन के विस्तारवाद के पक्षधर हो सकते हैं न पाकिस्तान के सांप्रदायिक दृष्टिकोण के दास हम तो मानव स्वतंत्रता के पक्षधर हैं जो हमें दूसरे देशों से भिन्न बनाता है। हर देश अपने को महान बताता है तथा उसके पीछे एक कारण होता है जो अक्सर अमानवीय प्रतीत होता है परन्तु भारत ही अपनी संस्कृति से महान है।
सब को अपना मानने की सोच ही भारत को ज़िंदा रखती है। जब स्वामी विवेकानंद सम्पूर्ण विश्व की यात्रा कर भारत वापस लौटे तो उन्होंने यही कहा कि पहले तो मैं दूसरों से सुन यह कहता था कि अपना देश महान है परन्तु अब मुझे यकीन हो गया है कि दुनिया में भारत जैसा कोई देश नहीं।
© सिद्धार्थ राणा
