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Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
1 Mar 2021·1 min read·

वो दिन सुहाने

वो तितली पकड़ने में होड़ पंछी संग गुनगुनाने के शोर

वो दिन कितने अच्छे थे सब के सब सच्चे थे । तब कच्चे घरों में रहते थे पर रिश्ते सारे पक्के थे ।

घर जब से हुए हैं पक्के सब रिश्ते टूट गए हैं ! नानी-दादी सब भूले अपनों से छूट गए हैं ?

जब मार पड़ी पापा से आती थी दौड़ी दादी । याद हैं अब भी वो सरकस बहानों से भरे पड़े थे तरकश

तब इत्मीनान करते थे इक-दूजे पर मरते थे । दरवाजों पर ना थी चौकस धारणा संदेही नहीं झरते थे ।

हंसी-ठिठोली-मस्ती ऐसी थी अपनी हस्ती । तब स्वांग नहीं भरते थे यारों संग सब साझा करते थे।

कागा जब भी आता था संग मेहमानों को लाता था। कोयल की कूक जगाती थी तब भोर भी हुआ करते थे ।

भूल चुके हैं बागों में जाना वो शाम का महफ़िल लगाना। जब शर्तो का नियम गढ़ते थे तब जीत-हार कहाँ तय करते थे।

लौटा दे वो बचपन पुराना तू ले ले चाहे सारा जमाना ।

©कुमार