← PrevNext →
Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
6 Jun 2021·1 min read·

वृक्ष लगाएं जीवन पाएं

सांस दे जीवन से रिश्ता जोड़ जाते हैं, जाते जाते भी लकड़ियां छोड़ जाते हैं !

रेल की पटरी से लेकर घर की चौखट खिड़कियां, यूँ तो जीवन में कितनी कुर्सियां तोड़ जाते हैं !

डूबने की जद में जब छोड़ देते आस सब, फिर वही बन कश्तियाँ किनारा छोड़ जाते हैं !

दर्द जो समझे नहीं तो राख सब हो जाएगा, देख कटते वृक्षों को अगर मुँह मोड़ जाते हैं !

फ़कत दर्द में हो ढूंढ़ते हमदर्द कब बन पाओगे, वृक्ष लगाएं जीवन पाएं ऐसा कुछ छोड़ जाते हैं !

©कुमार