युद्ध का बिगुल
प्रतिशोध की लपट्टों में,सबकुछ राख हो जाता है। देख -सुन तांडव, युद्ध का जन-जन अवाक् हो जाता है। मौत का इस कदर प्रलय नृत्य देख, जहां का खिलखिलाता गुलशन भी, खाक हो जाता है। जाने क्यों ये मनुज, भीषण विभीषिका के बावजूद ,समझ नहीं पाता है। जब हो जाता मगरूर हद से ज्यादा ,युद्ध का बिगुल बजाता है। विरान के चादर ओढ़ लेगी धरा, ये भूल जाता है। क्रंदन की अग्निशिखा में, लाखों मुस्कुराहट आहूत कर जाता है। मृत्यु का विकराल स्वरूप आवाहित कर, ज्ञानी होने का ढोंग रचाता है। सभी एक सृजेता के है सृजन, यह भूल जाता है। याद आता है अतीत के युद्ध परिणाम, फिर भी हथियार उठाता है। अपनी सजी सजाई बगियाँ, मृत्यु अनल को आहूत कर जाता है। समझ नहीं आता, यह मानव किस ज्ञान पर इट्ठलाता है?
© सतीश कुमार पाण्डेय
