← PrevNext →
जिंदगी का ब्याज
जिंदगी का मूलधन उड़ाता रहा व्यर्थ में, जिंदगी गर ब्याज चाहेगी तो होगा क्या ?
वो पूछ रहे थे इक दिन कि चाहते हो क्या ? मैंने आग़ाज किया तो बोले सुनकर होगा क्या ?
तमाशबीन हैं सारे खिलाड़ी धरी रह गई बाज़ी, महारथियों से पूछा चाल तो बोले चल कर होगा क्या ?
मुहब्बत के सारथी रहे हैं सदा से ही हम, इसलिए तो कहता हूँ कि जल कर होगा क्या ?
©# कुमार
