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Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

जिंदगी का ब्याज

जिंदगी का मूलधन उड़ाता रहा व्यर्थ में, जिंदगी गर ब्याज चाहेगी तो होगा क्या ?

वो पूछ रहे थे इक दिन कि चाहते हो क्या ? मैंने आग़ाज किया तो बोले सुनकर होगा क्या ?

तमाशबीन हैं सारे खिलाड़ी धरी रह गई बाज़ी, महारथियों से पूछा चाल तो बोले चल कर होगा क्या ?

मुहब्बत के सारथी रहे हैं सदा से ही हम, इसलिए तो कहता हूँ कि जल कर होगा क्या ?

©# कुमार