BHAJ GOVINDAM
श्री आदि शंकराचार्य कृत "भज गोविन्दम्" (मोहमुद्गरः)
यह प्रसिद्ध स्तोत्र आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित है, जिसे मोहमुद्गर (मोह को नष्ट करने वाला हथौड़ा) भी कहा जाता है। इसमें संसार की नश्वरता, मोह की व्यर्थता और भगवान गोविन्द (श्रीकृष्ण/विष्णु) की भक्ति की महत्ता पर बल दिया गया है।
कहा जाता है कि वाराणसी में एक वृद्ध व्याकरणज्ञ को पाणिनि के सूत्र कंठस्थ करते देख शंकराचार्य जी ने यह स्तोत्र रचा और उन्हें भक्ति की ओर प्रेरित किया। मूलतः १२ श्लोक (द्वादशमञ्जरिका) शंकराचार्य के हैं, शेष उनके शिष्यों के। कुल मिलाकर ३१-३३ श्लोक प्रचलित हैं।
नीचे मूल संस्कृत श्लोक तथा उनका हिंदी भावार्थ दिया जा रहा है:
॥ भज गोविन्दम् ॥
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते ।
संप्राप्ते सन्निहिते काले
न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे ॥१॥
भावार्थ: हे मूढबुद्धि! गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो। मृत्यु का समय निकट आने पर व्याकरण के "डुकृञ्" जैसे नियम तुम्हारी रक्षा नहीं करेंगे।
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं
वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥२॥
भावार्थ: धन कमाने की तृष्णा त्याग दो। मन में सत् बुद्धि जगाओ और तृष्णा से दूर रहो। अपने कर्म से जो धन मिले, उसी से मन को संतुष्ट रखो।
नारीस्तनभरनाभीदेशं
दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं
मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥३॥
भावार्थ: स्त्री के स्तन-नाभि आदि को देखकर मोह में न पड़ो। बार-बार विचार करो कि यह केवल मांस-वसा का विकार है।
नलिनीदलगतजलमतितरलं
तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं
लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥४॥
भावार्थ: कमल के पत्ते पर जल की बूंद जितनी चञ्चल है, जीवन भी उतना ही चञ्चल है। जान लो कि यह संसार रोग, अहंकार और शोक से ग्रस्त है।
यावद्वित्तोपार्जनसक्त-
स्तावन्निजपरिवारो रक्तः ।
पश्चाद्धन्त शरीरे रोगे
वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥५॥
भावार्थ: जब तक धन कमाने की शक्ति है, तब तक परिवार स्नेह दिखाता है। बुढ़ापे और रोग में घर में कोई पूछने वाला नहीं रहता।
यावत्पवनो निवसति देहे
तावत्पृच्छति कुशलं गेहे ।
गतवति वायौ देहापाये
भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥६॥
भावार्थ: जब तक शरीर में प्राण हैं, लोग कुशल पूछते हैं। प्राण निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है।
बालस्तावत्क्रीडासक्त-
स्तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः ।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः
परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥७॥
भावार्थ: बाल्य में खेल में, युवावस्था में स्त्री में, वृद्धावस्था में चिन्ता में आसक्त। परम ब्रह्म में कोई नहीं लगता।
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः
संसारोऽयमतीव विचित्रः ।
कस्य त्वं कः कुत आयात-
स्तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥८॥
भावार्थ: तेरी पत्नी कौन? पुत्र कौन? यह संसार बड़ा विचित्र है। तू किसका है? कहाँ से आया? हे भाई, यहीं तत्त्व का चिन्तन कर।
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं
निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं
निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥९॥
भावार्थ: सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से मोह का नाश, मोह नाश से तत्त्व की स्थिरता, और उससे जीवन्मुक्ति मिलती है।
वयसि गते कः कामविकारः
शुष्के नीरे कः कासारः ।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः
ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥१०॥
भावार्थ: बुढ़ापे काम-विकार कहाँ? सूखे तालाब में कमल कहाँ? धन क्षीण होने पर परिवार कहाँ? तत्त्व ज्ञात होने पर संसार कहाँ?
गेयं गीता नाम सहस्रं
ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम् ।
नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं
देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥२७॥
भावार्थ: गीता और विष्णु-सहस्रनाम का गान करो, श्रीपति के रूप का निरन्तर ध्यान करो, चित्त को सज्जनों के संग में लगाओ और धन दीनों को दान करो।
(शेष प्रमुख श्लोकों का संक्षिप्त उल्लेख)
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनम् ।
इह संसारे बहुदुस्तारे
कृपयापारे पाहि मुरारे ॥२१॥
भावार्थ: फिर जन्म, फिर मृत्यु, फिर माँ के गर्भ में शयन। इस दुस्तर संसार से हे मुरारे! कृपा कर पार उतारो।
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः
संसारादचिराद्भव मुक्तः ।
सेन्द्रियमानस नियमादेवं
द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ॥३१॥
भावार्थ: गुरु के चरणों में पूर्ण भक्ति से शीघ्र संसार से मुक्त हो जाओ। इन्द्रिय और मन को संयमित कर हृदय में स्थित देव को देखोगे।
अंतिम श्लोक:
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते ।
नामस्मरणादन्यमुपायं
नहि पश्यामो भवतरणे ॥३३॥
भावार्थ: गोविन्द को भजो, हे मूढ! भवसागर से पार उतरने का नाम-स्मरण से अन्य कोई उपाय नहीं दिखता।
यह स्तोत्र जीवन की नश्वरता और भक्ति की शाश्वतता का अद्भुत चित्रण है। इसका नियमित पाठ मोह से मुक्ति और भक्ति प्रदान करता है।
ॐ तत्सत्
