बनारस यात्रा
वाराणसी तो दिल से जंवा लग रही है, प्यारी लग रही है। शाम के ये पल, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय चमचमा रही है। बदलते रंग इनके, कभी ब्लू, कभी पिंक तो कभी येलो। मनमोहक लग रही है, ख़ूबसूरत लग रही है।
अस्सी घाट के उस पार, ओवरब्रिज के ऊपर से। गंगा के बिचोबीच, उसकी बहाव एवम् ठहराव। छोटी-छोटी नईया, किनारे लिए, पसरी हुई। शांत बैठी, लंबे अरसे से टूरिस्ट का इंतजार कर रही है।
मै आकाशवाणी से निहारता, गंगा के बीचोबीच ऊपर। बनारस के इस पार उस पार, अन्दर भी पास से जी रहा हूं। पहलवान लस्सी का, मिस्टी दही का मजा ले रहा हूं। वाराणसी तो दिल से जंवा लग रही है, प्यारी लग रही है।
गालियां संत नाम वाली सभी, अध्यात्म की दमक। शंकर के त्रिशूल की नोक पे, विश्वकर्मा की कृति। ऐसी वास्तु है जैसे मुक्ति के द्वार पास है। भोले शंकर की निवास करते जहां, काल भैरव भी है।
मंदिरों की ऐसी वास्तु श्रंखला, स्वतः मुक्ति दिलाता। ऐसा है बनारस, तप की यह नगरी। तांडव कर, आधुनिकता से गलबहियाँ कर रही है। चमचामा रही है, मनमोहक, खूबसूरत लग रही है।
वाराणसी तो दिल से जंवा लग रही है, प्यारी लग रही है। तांडव कर, आधुनिकता से गलबहियाँ कर रही है। मनमोहक लग रही है, ख़ूबसूरत लग रही है।
मै अपने कमरे में बैठ, सारे डॉट जोड़ रहा हूं। गुथकर माला, परोस रहा आपको, मनमोहक लगे आपको। वाराणसी तो दिल से जंवा लग रही है, प्यारी लग रही है।
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©#मिथिलेश कुमार
