Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

प्रकाश की किरण

कूप अंधेरा छाई ही सड़कों पर, पसरा चारो ओर सन्नाटा। फिर भी रास्ते खुद ही, रास्ते दे रही।

जैसे मानो, मंजिल की पुकार है, रास्ते। बुलंद हौसले, मजिल पाने को आतुर जैसे।

मानो वीरान अंधेरा ढलता जा रहा है, जीवन चलता जा रहा है। ऐसे ही जिंदगी कभी रुकती नही, कभी नही है इसका ठहराव। सवेरा होते ही, अंधेरा को जाना ही पड़ता है।

भले खाई हो कितनी बड़ी, समाज में, जात-पात, धर्म, लिंग एवम् क्षेत्रीयता की। प्रकाश का आगाज होने को बाकी, उजियारा चहुंओर है।

उजाला रुकती नहीं, अंधेरी की गहराई से, उसे तो जाना ही है। सांसें ना थमे, उजियारे अंधियाली के संघर्ष मे।

जुड़ी है, हरेक सांस के साथ, पल-पल की कहानी। सांसे गिन कर है, अनंत है इनका विस्तार।

ज़िंदगी के पहलू ये सारी, जीवन-मरण, विकास-विनाश, प्रकाश और अंधकार।

ज़िंदगी जल के भाँति सदा चलती जाती है, कभी ठहरती नही।

खाई पटती जाती है, अंधेरा छंटता जाता है। चारो ओर प्रकाश का डेरा फैला है। प्रकाश ही प्रकाश है, प्रकाश ही जीवन है।

#जीवन

©#मिथिलेश कुमार