Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·3 min read·1·

देह,बुद्धि और भावना

इस लेख का शीर्षक थोड़ा अटपटा सा है लेकिन मेरी कोशिश रहेगी कि इनकी बातों को पढ़कर आपको बोरियत महसूस न हो।

देह(Body) के बारे में मै इतना ही कहूँगा कि इसके माध्यम से हम चलते-फिरते है,देखते-सुनते है,सोते-जागते है,अपनी नित्य-क्रिया,इत्यादि करते है।खाना,पानी,कपड़े इत्यादि देह की बेसिक जरूरत है।जिसे हम काम-धंधे से आर्थिक उपार्जन करके प्राप्त कर लेते है।देह में कोई बीमारी हो जाता है तो हम डॉक्टर,वैद्य के पास जाकर ईलाज करा लेते है और कुछ दिन में तंदुरुस्त हो जाते है।मनुष्य से कई गुणा ज्यादा दैहिक सुख पशु प्राप्त करते है।एक हाथी,एक मनुष्य से सैकड़ों गुणा ज्यादा खाता है,और पानी पी जाता है।चीता आदमी से कई गुणा ज्यादा तेज दौड़ लगा सकता है।एक कबूतर दिन-भर में करीब 250-300 बार और एक बंदर 30-35 बार तक सेक्स कर सकता है।

बुद्धि(Intelligence) में हम जानवरों से अलग हो जाते है।शेर को पिंजरे में कैद करना,हाथी से सवारी कराना हम जानते है।बुद्धि लगाकर हम प्रश्नो के उत्तर देते है,परीक्षा पास करते है,जॉब करते है,बिजनेस करते है,आदि-आदि।बुद्धि विकसित करने में हमें परिवार,समाज,स्कूल,कॉलेज,देश,विदेश मदद करते है।रात-दिन एक करके,मोटी-मोटी किताबें पढ़कर,लैक्चर सुनकर हम बुद्धि बढ़ा सकते है।बुद्धि हमारी अनिवार्य आवश्यकता है,हमारे रोजी-रोटी का आधार यही है।

वर्तमान समय में देह-संवर्धन और बुद्धि-वर्धन के अनगिनत साधन और तकनीक उपलब्ध है।जिम करिये बॉडी बनाइये,जूस पीजिए स्फूर्तिपूर्ण रहिये।इसी तरह कोचिंग करिये,बुद्धि बढ़ाइए,अच्छी पैकेज वाली नौकरी पाइये।

भावना(Emotions) की तो कोई जरूरत ही नहीं महसूस होती है हमे अपनी लाईफ में!ये तो फालतू की चीज लगती है।खाओ,पियो और मजे करो तो देह और बुद्धि के बूते हो ही जा रहा है।एक शानदार जिंदगी के लिए और क्या चाहिए-फ़र्स्ट क्लास का होम,लोकेशन,आलीशान फ्लैट,सोफा,मेगा-स्क्रीन टीवी,वाईन,सेक्स,लग्ज़री वेहिकल,इत्यादि के अलावे?

दोस्तों,एक तीन-पहिये के वाहन का एक चक्का हटा दिया जाये तो क्या होगा?एक्सिडेंट।हमारी लाइफ भी कुछ इसी एक्सीडेंटल कंडिशन में चल रही है।कब पलट जाये कुछ पता नहीं।

मारी लाइफ में भावना का इम्पॉर्टेन्स बहुत ही ज्यादा है।उस स्थिति में तो यह हद से ज्यादा हो जाता है है जब हम अपने जीवन की तमाम उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं।मनुष्य उम्मीद में जीते रहता है।अपनी आँखों में कई सुनहरे सपने पालकर वह बड़ा होता है।अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव को खुशी-खुशी इसलिए बर्दास्त करता है कि आनेवाला कल अच्छा होगा।अपनी तस्वीर खिचकर अपने सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल पर शेयर करता है,यह सोचकर कि लोग उसकी तारीफ करे,उनपर गर्व करे,उसे सम्मान दें।काम पूरा करने पर जब अपना घर लौटता है,अपने परिवार के पास तो इस उम्मीद के साथ कि उसे वे प्यार दे।उसे महत्व दे,उसकी हाल-चाल पुछे।

लेकिन किसी कारणवश यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो व्यक्ति भावुक होता है।अपने भावना को कई रूपों में वह व्यक्त करता है;जैसे-क्रोधित होना,उत्तेजित होना,निराश होना,अवसादग्रस्त होना,अशांत होना,आदि-आदि।अपनी इस भावुकता को छुपाने के लिए वह कई साधनों का सहारा लेता है।जैसे गेम खेलना,दोस्तों से गप्पबाजी करना,नशा करना,टीवी देखना,अश्लील चीजों का सहारा लेना,इत्यादि।

भावना(Emotion) को नियंत्रित करने के लिये प्राचीनकाल में धार्मिक स्थलों में मनोरंजन की व्यवस्था की जाती थी।मन की तरंग को मारने के लिये ईश्वर प्रार्थना, संकीर्तन, संगीत, नृत्य का आयोजन किया जाता था।शास्त्रीय संगीत,शास्त्रीय नृत्य इन कार्यक्रमों में आयोजित होते थे।मध्यकाल तक यह परंपरा बनी रही।अंतर केवल इतना हुआ की धार्मिक स्थलों का स्थान राज-दरबार ने ले लिया।विदेशी शासक अपने साथ अपनी संस्कृति लेकर आया और भारतीय संस्कृति के साथ उसके विलय से एक हाइब्रिड किस्म की मनोरंजन कला का विकास हुआ।इन मनोरंजनों में सजीवता थी और यहाँ तक मनुष्य की चेतना सजीव बनी रही।

आधुनिक समय में निर्जीव मनोरंजन का प्रचलन हो गया है।सजीव रंगमंच और दरबार का स्थान टीवी,सिनेमा,कम्प्युटर और मोबाइल ने ले लिया है।मशीन द्वारा नियंत्रित चित्र,ध्वनि और प्रदर्शन ने हमारे मनोरंजन के अनुशासन को खत्म कर दिया है।धार्मिक स्थलों और राजदरबार में एक नियत समय पर कार्यक्रम होते थे,अब तो जब आपकी मर्जी पावर ऑन करिये और मनोरंजन करने लग जाइये।काम के समय मनोरंजन और मनोरंजन के समय टेंशन।

अपनी देह,बुद्धि और भावना में सामंजस्य की कला हमें एक सम्पूर्ण व्यक्ति बनाता है।हमे अपने जीवन के चरम लक्ष्य यानि सुखी,सम्पन्न और प्रसन्नता तक पहुँचाता है।इन तीनों के लिये हमें एक समान रूप से कार्य करना चाहिए।