Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

प्रिय विकास तुम लौट भी आओ

प्रिय विकास तुम लौट भी आओ

ईपीएल भी आ गया अब तो आकर जरा हमें बहलाओ ? दुनियां बदल गई हैं कब को ? आकर फिर से छा भी जाओ ?

गुड़िया भी अब घुमा करती बिन कोई अनिष्ट अंदेशा ? अमन चैन के इस बगिया में मूर्छित कोई पुष्प ना पाओ ?

प्रिय विकास तुम लौट भी आओ

महंगाई का कोई बात ना होगा बेरोजगारी पर व्यंग ना होगा ? निजीकरण और संविदा पर तनिको सा संवाद ना होगा ?

अब ना तुमसे पूछेंगे कुछ निष्कासन का दर्द कठिन हैं ? आकर अपने दर्द बिसारो किसानों को भूल ही जाओ ?

प्रिय विकास तुम लौट भी आओ

विगत वर्ष ही आना था तुम्हें तुमसे पहले कोविड आ गई ? गंगा कब की साफ हो गई यमुना भी इतराती छा गई ?

कंगना भी अब आ गई मुंबई रिया को जरा और नचाओ ? उलझे हैं सब चाइना में अभी जीडीपी को रिवर्स घुमाओ ?

प्रिय विकास तुम लौट भी आओ

©#कुमार