घर-संसार
चला तो मैं कब का जाता मगर कुछ लोग बाँध रखे हैं अपने प्यार- दुलार में । कुछ लोगों का प्यार- दुलार बह रहा है रक्त संचार में । उद्वेलित , चिंतित ,व्यथित हो जाता हूँ हर बार जिन्दगी बिचार में । हो जाता मायूस सदा जनसमूह के दुराचार में । रोक देता मैं साँसें अपनी ,इस स्वार्थी संसार में । हर बार उलझ जाता हूँ अपनों के प्यार, दुलार और संस्कार में । फिका- फिका दिखता सब कुछ आजकल इस संसार में । आज मायूसी और उदासी का पहरा है घर में,बाजार में । व्यथित करने की एक प्रथा निकल पड़ी है इस बिस्तृत संसार में । लोग कुचलते जा रहे हैं एकदूजे को लोभ और दरिंदगी के रफ्तार में । दीमक लग पड़ा है इस क्षण लोगों के संस्कार में । निलाम हो रहा है सब कुछ आजकल भरे बाजार में । एक दूजे के लोग बनें है शत्रु,अब घर -परिवार में । आओ शांति -सौहार्द, संयम- संतोष ,हँसी-खुशी की महफिल सजाते हैं, उदासी,लाचारी और दीनता के दरबार में । हँस के जिये सभी चार दिनों के जीवन विस्तार में ।
©सतीश कुमार पांडेय
