Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·2 min read·

खुश रहने के आधार-आध्यात्मिक जीवन का विकास

भौतिक सम्पन्नता और आध्यात्मिक सम्पन्नता को खुश रहने का दो सर्वमान्य आधार बताया गया है।भौतिक सम्पन्नता से देह स्तर की खुशी पायी जाती है और आध्यात्मिक सम्पन्नता से मानसिक स्तर की।पहला अनुराग का मार्ग है और दूसरा वैराग्य का।

देखा यह गया है कि भौतिक सुविधाओं,जैसे-जॉब,फैमिली, मकान,प्रसिद्धि,इत्यादि वाले व्यक्ति खुश नज़र आते है।उनके पास इतना अधिक संपत्ति और साधन होते है कि उनकी इच्छा के अनुसार चीजें उपलब्ध हो जाती है। भले ही तात्कालिक हो,लेकिन वे खुश हो लेते है।हालाँकि भौतिकता से सम्पन्न व्यक्तियों के आध्यात्मिकता की ओर जाने के कई उदाहरण हमारे सामने आये है;इनमें महात्मा बुद्ध, गान्धीजी, महर्षि अरविंद,इत्यादि का नाम आदरणीय है।

दूसरी तरफ,आध्यात्मिकता से भौतिकता की तरफ रुख करने वाले कुछ बाबाओं के नाम भी आते है।लेकिन सच में ये ढोंगी बाबा ही होते है।इनका भौतिकता से मन भरा ही नहीं;कुछ सिद्धि,चमत्कार दिखाकर इन्होंने पहले अपनी मंडली बनाई,फिर छोटा संगठन और फिर विशाल संगठन बना लिया।ये हमारे आदर्श नहीं हो सकते।ये क्रिमिनल होते हैं; इसीलिये कोर्ट इन्हें सजा सुनाती है और ये सजा काटते है।

यहाँ जानने योग्य तथ्य यह है कि आध्यात्मिक मार्ग पर जाने वाले लोग अपने जीवन की आवश्यकताओं को कम करने और परिस्थितियों से तालमेल बिठाने में निपुण होते है।वे अपने लिये नहीं जीते,अपनों के लिये जीते है।वे जीने के लिये खाते है,खाने के लिये नहीं जीते।

आध्यात्मिक मार्ग खुशी का sustainable मार्ग है,यह स्थायी है।जब बचपन में हमारे दाँत भी नहीं होते,हम स्कूल जाते है तो वहाँ जो प्रार्थना कराई जाती है उसमें आध्यात्मिकता की ओर हमें मोड़ने का प्रयास किया जाता है।जीवन के अंत में,जब हम जॉब या बिजनेस से रिटायर्ड हो चुके होते है,हमारे दाँत टूट चुके होते है,आँत कमजोर हो चुकी होती है,खाना हजम नहीं होता,अब भी आध्यात्मिक मार्ग में हम रुख करते है।

बीच का अलमस्त जवानी का जो पार्ट होता इसी पार्ट में हम जिंदगी को तहस नहस करते है।विवेकानंद जी ने इस पार्ट को तहस नहस नहीं होने दिया,कलाम साहब ने इस पार्ट को तहस-नहस नहीं होने दिया।

हमें भौतिकवादी बनना चाहिए या आध्यात्मिक,यह व्यक्तिगत चुनाव का विषय है।भारत का संविधान अपने नागरिकों को इसके लिये मौलिक अधिकार देता है,न्यायपालिका इन अधिकारों की रक्षा करती है।नागरीकों का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह अपनी खुशी के लिये दूसरों की खुशी का कत्ल न करे।