आत्महत्या का ईलाज है अध्यात्म में
अभी सरकारी नौकरी की तैयारी करनेवाले प्रतियोगियों में बैंकिंग और सिविल सेवा की तैयारी करनेवाले युवाओं की तादाद अन्य से बहुत ज्यादा है।आज के टाइम में सरकारी नौकरी मिल जाने की तुलना लोग मोक्ष पा जाने और भगवान मिल जाने से करने लगे है।कई सरकारी नौकरी के इम्तेहान में छटाने के बाद मैं भी इस बात का गवाह हूँ कि सरकारी नौकरी पाना एक अगला असंभव कार्य है।
सरकारी नौकरी के लिये जी-तोड़ मेहनत करने और उसके बाद सफल ना हो पाने के बाद अगर कोई अपनी आत्महत्या कर ले तो सामान्य सी बात लगती है।लेकिन सफल होने के बाद अगर कोई आत्महत्या करता है तो यह अन्वेषण का विषय हो जाता है।मेरे करीब के तीन लोगों ने हाल ही में आत्महत्या की है जिसकी उम्र 26 से 30 साल के बीच की है।एक बैंक ब्रांच मैनेजर,एक आईएएस(IAS)-DM,एक पत्रकार।
सबसे ताज़ी दुर्घटना गत शनिवार(सितम्बर 16,2017) की है।स्थान-आज़मगढ़,उत्तरप्रदेश।मेरे फास्टफ़्रेंड मनीष ने अपने आवास पर आत्महत्या कर लिया।वह करीब तीन साल से बैंक ऑफ इंडिया में एक ब्रांच मैनेजर था।इसके पहले वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एसोसिएट के रूप में कुछ सालों तक था।उसकी उम्र महज 30 साल की थी।5 साल पहले लव मैरिज किया,अभी ढाई साल की एक बच्ची है और करीब 10 महीने का एक बेटा।वाइफ भी बैंक ऑफ महाराष्ट्र में ब्रांच मैनेजर है।आत्महत्या का कारण हसबैंड-वाइफ और पैरेंट के बीच न बन पाना बताया जा रहा है।
दूसरी दुर्घटना,एक महीने पहले अगस्त 11,2017 की है।स्थान-गाज़ियाबाद,उत्तर प्रदेश।2012 बैच के बिहार कैडर के आईएएस(IAS) मुकेश पांडे ने रेलवे ट्रैक पर कटकर जान दे दी थी।मुकेश की उम्र मात्र 29 साल था।एक सेमिनार में मुकेश जी से मेरा मिलना हुआ था।मुकेश जी की भी एक छोटी सी बच्ची है।अपने प्रि-रीकॉर्डेड वीडियो में उन्होंने अपनी वाइफ का अपने साथ और अपने पेरेंट से ना बनने को बताया था।
तीसरी घटना,तीन साल पहले की है।स्थान-पटना,बिहार।एक महिला पत्रकार,श्रेया ने बंद कमरे में खुदकुशी कर ली।उसकी उम्र 26 साल के करीब था।वह एक पत्रकार थी।एक साल पहले उसकी शादी हुई थी और मरने के वक़्त उसके पेट मे 7-8 महीने का एक बच्चा था।मरने की वजह पति-पत्नी के बीच टकराहट बताया गया था।
उपरोक्त तीनो घटनाओं में एकरूपता(SIMILARITY) है।पहले केस में,व्यक्ति एक वरिष्ठ बैंक मैनेजर वह पब्लिक से लेकर GM तक को मैनेज कर रहा है लेकिन फैमिली को मैनेज नहीं कर सका।दूसरे केस में,व्यक्ति जिला अधिकारी है,पूरे जिले को सम्हाल रहा है लेकिन चार लोग की फैमिली नही सम्हाल पाया।तीसरे केस में,लेडी ने दुनियाँ जहान की खबरों को लोगों को पढ़ा दिया।लेकिन अपने दिल के दर्द की किसी को नही बात पाया।
हमारे वर्तमान प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था के सिलेबस में 'फैमिली मैनेजमेंट' नाम की चीज नही है। भारतीय संस्कृति(S), अध्यात्म(A) एवं धार्मिक(D),यानी SAD में परिवार प्रबंधन की बातें बताई गई है।भगवद्गीता में खुश रहने के दो मार्ग बताये गये है-आर्थिक विकास का मार्ग और आध्यात्मिक विकास का मार्ग।पहला भोगवादी है और दूसरा योगवादी।सोशल मीडिया,फ्री कालिंग सुविधा, वीडियो कॉलिंग सुविधा , सिनेमा ने हमारी लाईफ़ से सस्पेंस खत्म कर दिया है।कुछ भी जानना होता है पलक झपकते ही google कर लेते है।youtube पर लगभग हर जिज्ञासा का समाधान वाला वीडियो उपलब्ध है।
कभी पंद्रह मिनट के लिए आँखे बंद करके हम मैडिटेशन करना नही चाहते।अपने आप को जानने की जिज्ञासा ही नही होती।इस भौतिक जगत से परे भी एक सत, चित, आनंद की दुनियां है इसके लिए हम कभी वक़्त देना पसंद नही करते।SAD को बुढ़ापे की प्रैक्टिस मानते है।उपरोक्त आत्महत्या में बुढापा तो आया ही नही हैं।SAD के principles को अगर जवानी में ही अपनाया जय तो आत्महत्या की नौबत नही आयेगी।
साधन में सुख है ही नहीं।सुख तो मन में है।हम तो यू ही आपा-धापी में लगे रहते।दूसरों को कोसते रहते,अपनी बुराई को कभी झाँकते ही नही।
अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को छोड़कर प्रत्येक दिन कम से कम आधा घंटा हमे अपने आप को देना चाहिये।नदी किनारे या,घास पर खुले पैर या बगीचे में थोड़ी देर हवाओं के बहाव को सुनने,चिड़ियों की चहचहाहट को सुनने,गाय को जुगाली करते देखने,पत्त्ते हो हिलते हुए देखने,चीटियों के रैंडम पाथ को निहारने,छोटे बच्चे को खेलते हुए देखने जैसे उपक्रम हमें करने चाहिए।
डिजिटल दुनियाँ मायावी है।इस मायावी दुनियाँ से निकलकर अपने आप को थोड़ा समय दें,सोसाइटी में थोड़ा समय दें तो हम अकेलापन महसूस नही करेंगे।भगवान पर भरोसा करना,आस्तिक बनने में भी कोई नुकसान नही है। किसी व्यक्ति,वस्तु या स्थान से अत्यधिक लगाव नही रखना चाहिए।नाटक के बीच से अगर स्वतः एक्टर चला जाये तो यह एक्टर की कायरता सिद्घ करती है।हमें नेगेटिव रोल नहीं करना चाहिए।जब एक्टिंग में है तो धमाकेदार रोल निभाएं।अगर एक्टर नहीं तो विलन ही सही।लेकिन पूरा रोल करना हमारी ड्यूटी है।हमें कर्मठ बनना चाहिये,कायर नही।
