घर
घर भी एक नियम का घेरा, रहना भी एक तप। गृहस्थी भी एक रास्ता, मुक्ति का पथ।
अच्छा लगता है, बैचलर्स का जीवन। बंदिश जैसे लगती है, एक जेल है घर।
समझा करता, घर है खुलेपन का देरा। बस ये भी, नियम कानून का घेरा।
इसका भी एक संविधान है, अनुशासन भी। चलना पड़ता एक नियम से, बच्चे भी करते खेल।
पत्नी के भी ताने होते, जिम्मेदारी भी घर की। बच्चे मारते भी लात से, कहते पापा पापा।
कुछ बोल नहीं पाते, सब सुनकर नियम का पालन करते। ऐसा है जीवन अपना अपना, अच्छी लगती बैचलर्स का जीवन।
घर भी एक नियम का घेरा, रहना भी एक तप। गृहस्थी भी एक रास्ता, मुक्ति का पथ।
#गृहस्थी
©#मिथिलेश कुमार
