Aman Kumar Vikki
Aman Kumar VikkiCourseLiteraturePoetry
7 May 2021·1 min read·

बचपन

ढूंढ कर ला दो मेरा बचपन कोई शायद खो गई है यहीं कहीं ।

इसी जमीं पर इन्हीं गलियों में इन्हीं चौराहों पर अपने ही समाज में शायद खो गई है यहीं कहीं ।

लगता है जैसे चुरा ले गया कोई वो नटखट भरे दिन, वो शरारत भरी बातें और वो बूरी आदतें।

पर किसे बताऊँ ? किसका दरवाजा खटखटाऊँ ? कौन सी धारा लगवाऊँ ? कोई बता दे अभी ।

ढूंढ कर ला दो मेरा बचपन कोई शायद खो गई है यहीं कहीं ।

© अमन कुमार (विक्की)