बचपन
ढूंढ कर ला दो मेरा बचपन कोई शायद खो गई है यहीं कहीं ।
इसी जमीं पर इन्हीं गलियों में इन्हीं चौराहों पर अपने ही समाज में शायद खो गई है यहीं कहीं ।
लगता है जैसे चुरा ले गया कोई वो नटखट भरे दिन, वो शरारत भरी बातें और वो बूरी आदतें।
पर किसे बताऊँ ? किसका दरवाजा खटखटाऊँ ? कौन सी धारा लगवाऊँ ? कोई बता दे अभी ।
ढूंढ कर ला दो मेरा बचपन कोई शायद खो गई है यहीं कहीं ।
© अमन कुमार (विक्की)
