
योग भविष्य का धर्म
योग भविष्य का धर्म है। आनेवाले समय में भारत का विश्व को यही संदेश होगा कि सभी मनुष्यों के मूल में...
योग भविष्य का धर्म है। आनेवाले समय में भारत का विश्व को यही संदेश होगा कि सभी मनुष्यों के मूल में एक ही सत्ता है तथा भेद हमारी बर्हिमुखी दृष्टि के कारण है। एक यात्रा जगत की है तो एक अन्तर्जगत की। इनमें हमने भेद देखा तो भगवान को और संसार को अलग देख लिया। संसार अहम पर अवलंबित है तो भगवान विलय पर।
एक समरसता तभी आ सकती है जब व्यक्ति आत्मविस्तार में अपनी जीवन गति देखे। यानि हम खुद को जीवन उद्देश्य के अनुरूप सुधारें तो साथ ही जो आवांछनीय तत्व समाज में हैं उनके प्रति जागरूक रहते हुवे याद रखें कि हम विश्व ब्रह्मांड से एक हैं। अपनी प्रगति समष्टि जीवन के परिवर्तन में ही है। श्री अरविन्द ने जब सावित्री लिखी थी तो उनके लिए यह उस परिवर्तन की आवाज़ बनी जो धरती को उसकी मूल सत्ता से जोड़ने में सहायक हो।
योग उनके अनुसार व्यक्तिगत प्रयत्न से बढ़कर परम चेतना को अपने में उतरने देने की प्रक्रिया है। इसे गुरुदेव पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य के अनुसार चिंतन , चरित्र एवम् व्यवहार का परिष्कार भी कह सकते हैं। जो कुछ हममें ऐसा है जो परिवर्तन योग्य है उसे एक उच्च चेतना के अवतरण हेतु परिवर्तित करना ही योग है। फिर जीवन एक युद्ध ही हो जाता है क्योंकि हम जाग जाते हैं। हमें उठकर खड़ा होना होगा उस शाश्वत अमर पद की ओर जो कई मनीषियों ने धरती के सुंदर भविष्य का आधार माना है।
हमारी अकेले की जिम्मेदारी मात्र अपने हित की ही नहीं परन्तु अपने बोझ को उठाते हुए सृष्टि के बोझ को उठाना भी है। बोझ जड़ता का है, बिखराव का है, दिशाहीनता का है। योगमय जीवन बाह्य संसार में विचरण करते हुए एक अंर्तयात्रा है। हम सभी विशिष्ट समय में पैदा हुए विशिष्ट व्यक्ति हैं। यह परिवर्तन काल है जिसमें दुनिया उलट पुलत हो जाएगी। कोरोना महामारी ने आर्थिक, सामाजिक, व्यक्तिगत रूप से सभी को झकझोरा है।
क्या यही धरती की अंतिम परिणति है जहां दो कदम चल हमें औंधे मुंह गिरना था। या उज्ज्वल भविष्य हमारा इंतजार कर रहा है हमें मात्र उसके लिए अपने को पात्र बनाना है। प्रत्येक आत्मा एक उद्देश्य के तहत जन्म लेती है तथा यही उसकी व्याकुलता का कारण है।वही मनुष्य जो खुद को नहीं जानता एक आधिपत्य की नीति पर उतर आता है जो उसे प्रकृति को गुलाम बनाने की ओर प्रेरित करता है जब वह यह भूल जाता है कि वह खुद प्रकृति का गुलाम है तथा उसके सभी कृत्य एक उच्च चेतना के अपने को जानने के प्रयत्न भर हैं।
अध्यात्म मार्ग कष्ट भरा है क्योंकि सच्चाई को झूझना ही पड़ता है तथा पग पग पर दुश्मन मौजूद हैं। पर एक चेतना है जो झुकना नहीं चाहती क्योंकि वह इसके लिए भेजी नहीं गई। दुख भोगना पशुओं की तरह हमारी परिणति नहीं परन्तु हमें तो एक आंतरिक युद्ध लड़ना है जो उन विभीषिकाओं से है जो समय आने पर कुचल देना चाहती हैं आत्मा की पवित्रता, सुंदरता, अमरता, श्रेष्ठता को।
© सिद्धार्थ राणा