
हिन्दी भाषा का नवसृजन
हिन्दी दिवस आज मनाने की जरूरत न पड़ी होती । दिये होते अगर सहारा इसे शुरूआत में तो , आज अपने पैरो...
हिन्दी दिवस आज मनाने की जरूरत न पड़ी होती । दिये होते अगर सहारा इसे शुरूआत में तो , आज अपने पैरों पर खड़ी होती ।
अपने स्वाभिमान जगाये होते तो दुनियाँ की सभी भाषा सिर झुकाये डरी होती । चेत गए होते पहले ही तो दूजे की भाषा सीखने की इतनी ललक न बढ़ी होती।
लड़ना छोड़ दिये होते आपस में, तो यह भाषा जगत् में विशाल वृक्ष बन खड़ी होती । खुद से कर लिए होते समझौता तो न्यायालय में किसी और भाषा की जरूरत न पड़ी होती । दिये होते सहारा अगर तो,इसके उत्थान हेतु राजनीतिज्ञों की जरूरत न पड़ी होती ।
संजोये होते अपने अद्मय साहस को तो फिरंगियों की भाषा इसके समक्ष न खड़ी होती । दिये होते अगर सम्मान इसे माता सा तो आज तक सर्वोच्च सिंहासन चढ़ी होती ।
नव सृजन, नई उमंग, नया उत्साह से सुसज्जित होकर यह कई कदम बढ़ी होती । क्यों न कार्य ऐसा कि प्रत्येक दिवस मातृभाषा का दिवस हो जाए, जो इसे निन्दित करने वो भी इसी का जाए। ना निकल सके ताउम्र वह इसके दुनिया में ऐसा खो जाए।
©#सतीश