
आओ कुछ कर दिखाते है
अब खामोशी को जीवन का आधार बनाते हैं । बहुत बोले ,वक्त के संग अब खामोश हो जाते हैं । गैरों के सभ...
अब खामोशी को जीवन का आधार बनाते हैं । बहुत बोले ,वक्त के संग अब खामोश हो जाते हैं । गैरों के सभी गुनाहों को भूलाते है । दूजे के सभी एहसान को अपने सीने में बसाते है । आँसुओं को थामकर अब पसीना बहाते हैं । होते व्यथित जिनके यादों में ,अब उन्हें ही भूलाते है । अंधेरें पथ पर अब स्वयं ही दीया जलाते हैं । सीने की धधकती ज्वाला को, खुद के साहस से बुझाते है । घृणा, द्वेषता, मलिनता के भंवर से स्वयं को मुक्ति दिलाते हैं । बहुत रोये दूसरों के फिक्र में, अब अपने हिस्से हँसी के दरबार सजाते हैं ।
©सतीश कुमार पांडेय