Satish Kumar Pandey

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23 Jul 2021·2 min read

माई- बाबूजी के त्याग

घर में भईले ललनवा ,बाजल खूब बधाई । टोला, मोहल्ला, गाँव, जवार के लोग खाईल खूब मिठाई । देखी के उन...

घर में भईले ललनवा ,बाजल खूब बधाई । टोला, मोहल्ला, गाँव, जवार के लोग खाईल खूब मिठाई । देखी के उनकर सुनर मुँहवा, खुश भइले बाबा- मईया अऊर बाबूजी-माई। सब केहू पीछे- पीछे दऊरे धधाई- धधाई। घरवा में आवे लागल उहे, जवन बबूआ के मनवा देबे लुभाई। तनिका बड़ भइले बबूआ तब शुरू भइल उनकर पढ़ाई । मोरे बाबू पढ-लिख के बनिहे हाकिम,कहे लागल लो बाबूजी- माई। बबूआ के पढ़ाई में बाबा के जमीन, अऊर माई के गहनों गइल बिकाई। माई करत रही पोछा-बर्तन ,लोगन के घर- घर जाई-जाई। मोरा कलेजा के टुकडा बनके अइहे हाकिम,इहे आस में आपन सुख- चैन दिहली बिसराई। माई -बाबूजी के अखियाँ ताकत रहे कि बाबूआ हाकिम बनके कब आई? खतम हो गईल इंतजार के घड़ि ,बाबू के नौकरी के खबर सुना गईल। माई-बाबूजी के त्याग खुशहाली के फूल खिला गईल। देबे खातिर बधाई दूर- दूर से लोग बाग आ गईल । अइसने माई- बाबूजी मिलस सब केहू के, इहे शब्द चारुओर सुना गईल । बड़ा भाग्यशाली बा ऊ बेटा, जे अइसन माई-बाबूजी के लाल बनके आ गईल। बबूआ के होई जाइत बियहवा,माई के मनवा मे चिंता समा गईल । माई के इहो अरमान पूरा भईल, बबूआ के जीवन बियाह के बंधन में बंधा गईल । महिनों ना बिते पावल कि माई- बाबूजी के खाईल निरेखा गईल। दवा- दारु के भी अब जिनिगी मोहताज हो गईल। जे कुछ ना कइल,ओकरे माथे पर अब ताज हो गईल । जिनगी के कईल सब कुछ एके क्षण में खाक हो गईल । घर से बाहर निकले के फरमान सुना गईल । अब दूनो बेरा के दुगो रोटी के संकट गहरा गईल । सजल रहे माई-बाबूजी के अखियाँ में जवन सपना,ओकरा के लोरवा बहा गईल । बुझाये लागल कि अब अन्हरिया के साथ हो गईल, आपने करेजवा के टुकड़ा बेहाथ हो गईल । दूनो लोग (माई-बाबूजी) गिर गइलन धरती पर, अब उनकर अंतिम बुलावा आ गईल । फफक- फफक के जिनिगिया के दीया हरदम खातिर बुता गईल। एगो अऊर माई- बाबू के विश्वास टुटल आ ऊ आपन जीवन के त्याग पर पछता गईल । बुझात नइखे कि अब कईसन समय आ गईल। इ आँसू के एक- एक कतरा के होई हिसाब,विधना आपन अंतिम फरमान सुना गईल । कब तक होत रही जीवन देबे वाला के अपमान, अब इ प्रश्न गहरा गईल ।

©सतीश कुमार पांडेय

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